दीयों के इस त्यौहार का अर्थ अब भी हम SAMJH नही
पाये क्या । बारूद के हम इतने शौकीन कब तक रहेंगे
क्या हमें इनका शोर और किसी बम दमके का शोर एक जैसा नही लगता
क्या यह हमारे भीतर के शोर की रिफ्लेक्शन तो नही
क्या हमारे शांत होने का समय बितर और बहार से अभी भी दूर है । वर्षों दीपावली
MANANE पर भी क्या हम यह एक बात उस दिए से सीख पाए हैं जो ख़ुद जलकर दूसरों को रौशनी देता है , हर दीपावली में हमने क्या नया पाया । किसी चेहरे पे मुस्कान लाने की कामयाबी हमें मिले अगर तो मुझे लगता
दिए तो वही हैं और दीपावली भी वही है ।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
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