शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

दीपावली और पटाखे

दीयों के इस त्यौहार का अर्थ अब भी हम SAMJH नही
पाये क्या । बारूद के हम इतने शौकीन कब तक रहेंगे
क्या हमें इनका शोर और किसी बम दमके का शोर एक जैसा नही लगता
क्या यह हमारे भीतर के शोर की रिफ्लेक्शन तो नही
क्या हमारे शांत होने का समय बितर और बहार से अभी भी दूर है । वर्षों दीपावली
MANANE पर भी क्या हम यह एक बात उस दिए से सीख पाए हैं जो ख़ुद जलकर दूसरों को रौशनी देता है , हर दीपावली में हमने क्या नया पाया । किसी चेहरे पे मुस्कान लाने की कामयाबी हमें मिले अगर तो मुझे लगता
दिए तो वही हैं और दीपावली भी वही है ।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

मित्रों की याद

मित्रों की यादें तो आती हैं ।
बचपन से जवानी का सफर याद तो आता है ।
गलतियों का सिलसिला बिना किसी अकलमंदी के जारी तो है ।
उस उपरवाले का साथ न होता तो इस दुनिया से कौन बचाता ।
बनाया बी उसने संबआला भी उसने ।
बचपन के मित्र कुछ ज़्यादा याद आते हैं ।
क्योंकी उनकी यादों में हमारा बचपन छुपा होता है ।

कुछ लिखने की कोशिश

मै मै करते ज़िन्दगी एक दिन खो ही जाती है ।
हर पल यूँ ही पल पल करके बीत ही जाता है ।
जब सफर ही है जीवन तो हम सब ठिकानों के बारे में इतना क्यों सोचते हैं ।
गाड़ी जीवन की जिसका ड्राईवर वही है ।
फिर रास्तों की फिकर हम क्यों करते हैं ।
लुत्फ़ तो लेना ही है बस वही तो है ज़िन्दगी ।
खुशी हो या की गम पर लुत्फ़ लेना जरी रहे ।